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FIR के लिए भी नया कानून बना दिया क्या कप्तान साहब ने?

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शराब ठेकेदार का नाम सुनते ही क्यों कांप गई खाकी?

कटनी। जिले में कानून का राज चल रहा है या रसूखदारों का? यह सवाल इसलिए क्योंकि स्लीमनाबाद थाना एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। चंद दिनों पहले इसी थाने में आवेदन की पावती देने के नाम पर हजारों रुपये मांगने का मामला सामने आया था। शिकायत के बाद पुलिस अधीक्षक अभिनव विश्वकर्मा ने कार्रवाई तो की, लेकिन कार्रवाई केवल निचले स्तर तक सीमित रही। थाना प्रभारी की जवाबदेही तय करने से बचते हुए मामले को लाइन अटैच और निलंबन तक समेट दिया गया। अब सामने आया नया मामला उस कार्रवाई की प्रभावशीलता और कप्तान की कार्यप्रणाली दोनों पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है।

ताजा मामला एक ऐसे फरियादी का है जो अपनी जान-माल की सुरक्षा की गुहार लेकर स्लीमनाबाद थाने पहुंचा था। उसके पास लिखित आवेदन था, धमकी मिलने का आरोप था और न्याय की उम्मीद भी। लेकिन आरोप है कि शिकायत दर्ज करने के बजाय उसे फटकार लगाकर थाने से भगा दिया गया।

फरियादी का दावा है कि जिन लोगों पर उसने धमकी देने का आरोप लगाया, उनमें जिले का एक रसूखदार शराब ठेकेदार भी शामिल है। यहीं से सवाल और गंभीर हो जाते हैं। क्या स्लीमनाबाद थाने में कानून की किताब देखने से पहले यह देखा जाता है कि आरोपी कितना प्रभावशाली है? क्या आम आदमी और रसूखदार लोगों के लिए अलग-अलग पुलिसिंग लागू है?

यदि शिकायत झूठी थी तो पुलिस जांच करती, तथ्यों की पड़ताल करती और सच्चाई सामने लाती। लेकिन शिकायत दर्ज ही नहीं करना आखिर किस कानून का हिस्सा है? क्या अब FIR दर्ज कराने के लिए भी फरियादी को आरोपी की हैसियत और पहुंच का प्रमाण पत्र साथ लेकर जाना होगा?

सबसे बड़ा सवाल पुलिस अधीक्षक की कार्यप्रणाली पर खड़ा होता है। अपराध मुक्त जिले के दावे, सख्त पुलिसिंग के दावे और जनता की सुरक्षा के दावे आखिर जमीन पर क्यों दम तोड़ रहे हैं? यदि एक व्यक्ति खुद को असुरक्षित बताकर थाने पहुंचता है और उसे ही वहां से भगा दिया जाता है, तो फिर आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करे?

जिले में यह चर्चा आम है कि शराब कारोबार से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोगों का दबदबा इतना बढ़ चुका है कि उनके खिलाफ शिकायत करने से पहले लोग दस बार सोचते हैं। गांव-गांव में पैकारी और अवैध शराब के आरोप वर्षों से लगते रहे हैं, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार हमेशा सवालों के घेरे में रही है। ऐसा प्रतीत होता है मानो अवैध कारोबार रोकने की जिम्मेदारी निभाने वाले विभागों ने आंखें मूंद ली हों।

अब सवाल केवल स्लीमनाबाद थाने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या कटनी पुलिस में जवाबदेही सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है? क्या अधीनस्थ अमले में वरिष्ठ अधिकारियों का भय समाप्त हो चुका है? या फिर कुछ ऐसे नाम हैं जिनके सामने खाकी भी बौनी पड़ जाती है?

अब निगाहें एक बार फिर पुलिस अधीक्षक पर हैं। क्या फरियादी की शिकायत पर निष्पक्ष जांच होगी? क्या यह पता लगाया जाएगा कि थाने में शिकायत क्यों नहीं ली गई? क्या धमकी देने के आरोपों की जांच होगी? या फिर यह मामला भी उन फाइलों में दफन हो जाएगा जहां सच अक्सर रसूख के बोझ तले दब जाता है?

-: कटनी में कानून का राज चल रहा है या रसूख का ?

 

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