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कटनी में खाकी भी नहीं सुरक्षित! क्या अपराधियों में खत्म हो गया पुलिस का खौफ? आमजनता तो असुरक्षित महसूस कर ही रही अब अधीनस्थों की सुरक्षा पर उठे बड़े सवाल

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कटनी में खाकी भी नहीं सुरक्षित!

क्या अपराधियों में खत्म हो गया पुलिस का खौफ? आमजनता तो असुरक्षित महसूस कर ही रही अब अधीनस्थों की सुरक्षा पर उठे बड़े सवाल

कटनी। जिले में अपराधियों के बढ़ते हौसले अब उस स्तर तक पहुंच चुके हैं जहां खाकी वर्दी भी सुरक्षित नजर नहीं आ रही। कोतवाली थाना क्षेत्र में डायल-112 के ऑन-ड्यूटी आरक्षक के साथ हुई मारपीट की घटना ने पुलिस व्यवस्था की मजबूती और अपराधियों पर नियंत्रण के दावों की पोल खोल दी है। घटना का वीडियो वायरल होने के बाद कार्रवाई तो हुई, लेकिन इसने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब पुलिस नेतृत्व को देना होगा।

रविवार देर रात एक विवाद की सूचना पर मौके पर पहुंचे आरक्षक रूपेश यादव को शायद अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि कानून व्यवस्था संभालने पहुंचे पुलिसकर्मी को ही अपराधियों के हाथों अपमानित होना पड़ेगा। वायरल वीडियो में दिखाई दे रही घटना केवल एक पुलिसकर्मी के साथ मारपीट नहीं, बल्कि पूरे पुलिस महकमे की साख को खुली चुनौती मानी जा रही है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अपराधियों के मन से पुलिस का भय खत्म क्यों होता जा रहा है? क्या जिले में लगातार हो रही आपराधिक घटनाओं ने बदमाशों को यह संदेश दे दिया है कि कानून का शिकंजा अब उतना मजबूत नहीं रहा? यदि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी पर हाथ उठाने से पहले अपराधी एक बार भी नहीं सोच रहे, तो आम नागरिकों की सुरक्षा का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

पिछले कुछ महीनों में कटनी में चाकूबाजी, फायरिंग, अवैध शराब कारोबार, नशे के नेटवर्क, मारपीट, चोरी डकैती लूट और कानून-व्यवस्था से जुड़ी घटनाओं की लंबी फेहरिस्त सामने आई है। हर घटना के बाद पुलिस कार्रवाई के दावे जरूर करती है, लेकिन अपराधों की रफ्तार थमती नजर नहीं आ रही। यही वजह है कि अब सवाल सीधे पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व और अधीनस्थों पर पकड़ को लेकर उठने लगे हैं।

पुलिस मुख्यालय से लेकर जिला स्तर तक लगातार अपराध नियंत्रण के निर्देश जारी होते हैं, लेकिन जमीनी हालात कुछ और कहानी बयां कर रहे हैं। आखिर ऐसी कौन-सी कमी है कि अपराधी पुलिस की मौजूदगी में ही कानून को ठेंगा दिखाने का साहस कर रहे हैं? क्या अपराधियों में कार्रवाई का भय कम हुआ है या फिर रोकथाम की रणनीति कमजोर साबित हो रही है?

वर्दी पर हमला किसी एक आरक्षक का नहीं, बल्कि पूरे कानून-व्यवस्था तंत्र का अपमान माना जाता है। ऐसे में यह घटना केवल एफआईआर और गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इस बात की गंभीर समीक्षा भी जरूरी है कि अपराधियों के हौसले लगातार बुलंद क्यों हो रहे हैं।

क्या पुलिस केवल घटनाओं के बाद कार्रवाई करने तक सीमित रह जाएगी, या फिर ऐसा माहौल बनाया जाएगा जहां अपराधी वारदात करने से पहले ही कानून के भय से कांपें? क्योंकि जिस जिले में खाकी सुरक्षित नहीं, वहां आम आदमी की सुरक्षा का दावा भी सवालों के घेरे में आ जाता है।

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