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पश्चाताप या फिर बेबसी? रसूख के आगे बेबस ‘साहब’ का इकबाल! या फिर पुलिस लाइन बनी ‘वॉशिंग मशीन’

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जिले मे सिर्फ ‘कार्रवाई का ढोंग’; आरक्षक से लेकर निरीक्षक तक खुद को समझ रहे कप्तान से ऊपर, चंद दिनों में लाइन से मैदान में लौट रहे चहेते!

कटनी – जिले में पुलिसिया इकबाल और कानून व्यवस्था अब पूरी तरह रसूखदारों की चौखट की दासी बनती नजर आ रही है। स्लीमनाबाद में गंभीर आरोप-प्रत्यारोपों के बाद दो-दो अधिकारियों को हटाना हो या बहोरीबंद के बहुचर्चित 500 रुपये रिश्वत प्रकरण में फिल्मी स्टाइल में की गई ‘कप्तान साहब’ की कार्रवाई—सब महज एक छलावा साबित हो रहे हैं।
बहोरीबंद मामले में जिस थाना प्रभारी अखिलेश दहिया को पूरी जवाबदेही मढ़ते हुए लाइन का रास्ता दिखाया गया था, उन्होंने वापस आकर जिले के सबसे मलाईदार थानों में से एक ‘कुठला’ की कमान संभाल ली है। इस नाटकीय घटनाक्रम ने प्रशासनिक गलियारों में बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि यह फैसला पुलिसिया ‘पश्चाताप’ है या फिर किसी अदृश्य राजनैतिक ‘दबाव’ का नतीजा?

नेताओं के ‘खास’ के आगे बेबस कप्तानी!

प्रशासनिक गलियारों और आम जनता के बीच अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि जिले में नेताओं की जी-हुजूरी करने वाले वर्दीधारियों पर ‘साहब’ का कोई बस नहीं चल पा रहा है। आरक्षक से लेकर निरीक्षक (टीआइ) तक, कई कर्मचारी सत्ता और रसूख के नशे में इस कदर चूर हैं कि वे खुद को कप्तान से भी ज्यादा पावरफुल समझते हैं। हालात यह हो चुके हैं कि जब किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार या लापरवाही के गंभीर आरोप लगते हैं, तो जनता के गुस्से को शांत करने के लिए साहब उन्हें लाइन का रास्ता तो दिखा देते हैं, लेकिन परदे के पीछे से नेताओं का फोन आते ही उनके हाथ कांपने लगते हैं।

फिल्मी अंदाज में कार्रवाई, फिर ‘क्लीन चिट’ का खेल

कुछ समय पहले जब बहोरीबंद में रिश्वत का मामला सामने आया था, तो दो-दो महिला डीएसपी स्तर की अधिकारियों ने जिस सक्रियता से जांच और कार्रवाई की पटकथा लिखी, उससे लगा था कि अब व्यवस्था सुधरेगी। संदेश दिया गया कि भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ है। लेकिन वक्त बीतते ही इस पूरे मामले का पटाक्षेप उम्मीद के विपरीत हुआ। आरोप-प्रत्यारोपों का पूरा मामला मानो ‘वॉशिंग मशीन’ में धुलकर साफ हो गया और दागी चेहरे फिर से ठाठ के साथ मलाईदार पोस्टिंग पर काबिज हो गए।

महज औपचारिकता बनकर रह गई ‘पुलिस लाइन’?

इस लचर व्यवस्था ने पुलिस महकमे के भीतर और जनता के बीच कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

जनता की आंखों में धूल: स्लीमनाबाद से लेकर बहोरीबंद तक का घटनाक्रम गवाह है कि लाइन भेजना अब कोई सजा या सुधार की प्रक्रिया नहीं, बल्कि चंद दिनों के लिए मामले को ठंडे बस्ते में डालने और जनता को शांत करने का जरिया बन चुका है।

सिस्टम से खत्म हुआ डर: जब दागी अधिकारियों को पता है कि कुछ ही दिनों में वे फिर से फील्ड में लौट आएंगे, तो उनके भीतर से प्रशासनिक कार्रवाई का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है।

कमजोर पड़ता प्रशासनिक नेतृत्व: यदि शुरुआती कार्रवाई सही थी तो वापसी क्यों की गई, और यदि वापसी सही है तो कार्रवाई का ढोंग क्यों रचा गया? ऐसे में संदेश यही जाता है कि न तो अब किसी को लाइन में रखने की ताकत बची है और न ही कार्रवाई को उसके तार्किक अंजाम तक पहुंचाने की इच्छाशक्ति।

दस्तखत साहब के, पटकथा कहीं और की!

“चर्चाओं का बाजार गर्म है कि जिले में कानून का राज नहीं, बल्कि नेताओं और जिले से बाहर बैठे वरिष्ठ अधिकारियों की सिफारिशों का राज चल रहा है। कप्तान साहब की लाचारी इस कदर उजागर हो चुकी है कि आदेशों पर हस्ताक्षर भले ही उनके होते हों, लेकिन उसकी पूरी पटकथा और किरदारों का चयन कहीं और से तय किया जा रहा है। परदे के पीछे बैठे ‘मास्टरमाइंड’ जैसा चाहते हैं, फाइलें वैसी ही घूम जाती हैं। जनता अब खुद को ठगा सा महसूस कर रही है।”

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