खाकी बेअसर: भट्टा मोहल्ला में बुजुर्ग पर सरेराह जानलेवा हमला, जिला अस्पताल में मौत से जंग लड़ रहे हमीम; दहशत के साये में शहर
विशेष संवाददाता, कटनी।
कटनी की शांत आबो-हवा में एक बार फिर बेखौफ अपराधियों का तांडव शुरू हो गया है। ऐसा लगता है कि शहर की सड़कों से कानून का खौफ पूरी तरह गायब हो चुका है। चाकूबाजी और सरेराह खून-खराबा अब कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि रोज की रवायत बनता जा रहा है। रंगनाथ थाना क्षेत्र के भट्टा मोहल्ला में 57 वर्षीय मोहम्मद हमीम पर हुए जानलेवा हमले ने पुलिसिया गश्त और कानून-व्यवस्था के दावों की सरेआम धज्जियां उड़ा दी हैं। सीने और पेट पर ताबड़तोड़ चाकू लगने से लहूलुहान हमीम जिला अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं, और हमेशा की तरह वारदात को अंजाम देकर हमलावर पुलिस को ठेंगा दिखाते हुए आसानी से फरार हो गया।
कहां खो गई पुलिस की सख्ती? बदमाशों में खत्म हुआ कानून का डर
शहर के चौराहों और नुक्कड़ों पर बस एक ही चर्चा है— आखिर अपराधियों में पुलिस का डर पूरी तरह खत्म क्यों हो गया? लोग खुलकर कह रहे हैं कि गुंडे-बदमाशों और जिलाबदर अपराधियों पर जिस तरह की कड़ाई होनी चाहिए, वह अब धरातल पर कहीं नजर नहीं आ रही। नतीजा यह है कि ठंडे बस्ते में जा चुके चाकूबाज, नशेड़ी और गैंगबाज फिर से सिर उठाने लगे हैं। सरेआम धौंस जमाना, कट्टा लहराना और बात-बात पर चाकू घोंप देना अब कटनी की नई हकीकत बनता जा रहा है। आम नागरिक अब शाम ढलते ही बाहर निकलने में असुरक्षित महसूस करने लगा है।
खुफिया तंत्र ‘कोमा’ में, क्यों सोती रही रंगनाथ पुलिस?
भट्टा मोहल्ला की इस खूनी वारदात की जड़ें पुरानी रंजिश और स्थानीय गैंग विवाद से जुड़ी बताई जा रही हैं। ऐसे में सुलगता हुआ सवाल यह है कि यदि पुलिस को इस सुलगते विवाद की भनक पहले से थी, तो समय रहते निवारक (प्रिवेंटिव) कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या कटनी पुलिस का खुफिया तंत्र पूरी तरह ‘कोमा’ में जा चुका है, या फिर थाना स्तर पर अपराधियों की गतिविधियों की लगातार अनदेखी की जा रही है? जब इलाके की बीट पुलिस और गश्ती दल अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन हो जाएं, तो अपराधियों का बेलगाम होना लाजिमी है।
केवल लकीर पीटेगी पुलिस या दिखेगा कोई कड़ा एक्शन?
भट्टा मोहल्ला की यह वारदात सिर्फ एक बुजुर्ग पर हमला नहीं, बल्कि कटनी पुलिस की प्रशासनिक क्षमता और गश्त व्यवस्था को अपराधियों की खुली चुनौती है। कटनी की सड़कों पर लगातार बहता खून वर्तमान पुलिस कप्तानी से सीधे जवाब मांग रहा है कि आखिर अपराध होने से पहले उसे रोकने की कोई ठोस रणनीति वजूद में है भी या नहीं? क्या खाकी का काम सिर्फ वारदात के बाद ‘लकीर पीटना’, एफआईआर दर्ज करना और गिरफ्तारी की रस्म अदायगी तक सीमित रह गया है?
अब देखना यह है कि वर्तमान पुलिस प्रशासन इस मामले में केवल कागजी खानापूर्ति करता है या फिर शहर में सक्रिय चाकूबाजों, नशेड़ियों और गैंगबाजों के खिलाफ कोई ऐसा कड़ा ‘सफाई अभियान’ चलाता है, जिससे अपराधियों की रूह कांप उठे और आम जनता को इस खौफ से मुक्ति मिले।










