कार्यकाल पूरा न होने वालों पर गिरी गाज, 20 साल से जमे ‘अंगद’ बने पुलिसकर्मी सुरक्षित
‘दिया तले अंधेरा’! कप्तान कार्यालय में वर्षों से जमे कर्मचारियों पर भी नहीं गई नजर
कटनी। पुलिस मुख्यालय और डीजीपी के निर्देशों के बाद जिले में जारी की गई तबादला सूची अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। सूची सामने आने के बाद पुलिस महकमे के भीतर ही चर्चाओं का बाजार गर्म है। आरोप लग रहे हैं कि तबादलों में नियमों और कार्यकाल से ज्यादा प्रभाव, पहुंच और पसंद-नापसंद ने भूमिका निभाई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सूची में कई ऐसे पुलिसकर्मियों के नाम शामिल हैं जिनका निर्धारित कार्यकाल अभी पूरा भी नहीं हुआ था। इसके बावजूद उनका तबादला कर दिया गया। वहीं दूसरी ओर जिले में ऐसे कर्मचारी भी मौजूद हैं जो पांच, दस, पंद्रह ही नहीं बल्कि बीस वर्षों तक एक ही जगह पर जमे हुए हैं, लेकिन उनकी ओर किसी की नजर तक नहीं गई।
क्या शिकायत और नाराजगी बनी तबादले का आधार?
पुलिस विभाग के अंदरखाने चर्चा है कि जिन कर्मचारियों की राजनीतिक पहुंच कमजोर है, जो किसी रसूखदार के करीबी नहीं हैं या जो किसी अधिकारी की नाराजगी का कारण बन गए, उन्हीं के नाम सूची में प्रमुखता से शामिल किए गए। जबकि राजनीतिक संरक्षण प्राप्त और अधिकारियों की जी-हुजूरी में माहिर कर्मचारी पूरी तरह सुरक्षित निकल गए।
महकमे में चर्चा है कि कुछ कर्मचारियों के खिलाफ शिकायतें पहुंचीं तो तत्काल कार्रवाई हो गई, लेकिन वर्षों से एक ही स्थान पर जमे कर्मचारियों के मामले में नियम और नीति दोनों खामोश नजर आए।
‘अंगद’ बने कर्मचारियों को किसका संरक्षण?
तबादला सूची के बाद सबसे ज्यादा चर्चा उन कर्मचारियों को लेकर है जो वर्षों से मलाईदार पदों पर जमे हुए हैं। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऐसे कर्मचारियों को किसका संरक्षण प्राप्त है कि डीजीपी की तबादला नीति भी उन तक नहीं पहुंच पाई?
कई कर्मचारियों का कहना है कि यदि वास्तविक रूप से कार्यकाल के आधार पर तबादले किए जाते तो सबसे पहले उन लोगों की सूची बनती जो लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ हैं। लेकिन सूची देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि नियमों की तलवार केवल चुनिंदा लोगों पर ही चली।
‘दिया तले अंधेरा’—कप्तान कार्यालय भी सवालों के घेरे में
तबादला सूची पर उठ रहे सवालों के बीच एक और चौंकाने वाली चर्चा सामने आ रही है। जिले भर के थाना, चौकी और शाखाओं में तो तबादले कर दिए गए, लेकिन पुलिस अधीक्षक कार्यालय में वर्षों से जमे कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं हुई।
सूत्रों के अनुसार एसपी कार्यालय में ऐसे कई कर्मचारी हैं जो लंबे समय से एक ही शाखा और एक ही जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। यदि तबादलों का आधार कार्यकाल और प्रशासनिक आवश्यकता थी, तो फिर कप्तान कार्यालय में जमे कर्मचारियों को इस प्रक्रिया से बाहर क्यों रखा गया?
यही वजह है कि अब पुलिस विभाग के गलियारों में एक ही कहावत सबसे ज्यादा सुनाई दे रही है— “दिया तले अंधेरा।”
ईमानदार हटे, पहुंच वाले बचे?
तबादला सूची जारी होने के बाद कर्मचारियों के बीच यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि ईमानदारी से ड्यूटी करने वाले और बिना राजनीतिक ‘माई-बाप’ वाले कर्मचारियों को इधर-उधर कर दिया गया, जबकि रसूखदारों और प्रभावशाली लोगों के करीबी कर्मचारी अपनी जगह बचाने में सफल रहे।
कुछ कर्मचारियों का तो यहां तक कहना है कि जिन लोगों की राजनीतिक पकड़ मजबूत है या जो वरिष्ठ अधिकारियों के विशेष कृपापात्र माने जाते हैं, उन्हें हटाने की क्षमता अब सिस्टम में किसी के पास नहीं बची है।
जवाब मांग रहे हैं सवाल
यदि डीजीपी के निर्देशों का अक्षरशः पालन हुआ है तो फिर कार्यकाल पूरा न करने वाले कर्मचारियों का तबादला क्यों किया गया? और यदि नियम सभी के लिए समान हैं, तो वर्षों से जमे कर्मचारियों तथा कप्तान कार्यालय के ‘स्थायी चेहरों’ को छूट किस आधार पर दी गई?
तबादला सूची ने पुलिस महकमे में एक नई बहस छेड़ दी है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इन सवालों का जवाब मिलेगा या फिर तबादलों की यह सूची भी प्रभाव और पहुंच के सामने नियमों की हार का एक और उदाहरण बनकर रह जाएगी। :::
हालांकि ये वही तबादला सूची है जिसमे कुछ कर्मियों के ताबदलने मे दो दो जगह नाम है और जलबाजी मे साहब ने बिना पढ़े ही लगता है आपने हस्ताक्षर भी कर दिए
इस तरह की लापरवाही जितनी सूची बनाने वालो की उतनी ही जाँचकर फाइनल करने वालो की भी है और कप्तान तो निकले विभाग मे जिले मुखिया तो समरथ को नहीं दोष गोसाई
ये लाइन पूर्वजों ने इन्ही लोगो के लिए लिखी है।
आगे आगे देखिये इन ईमानदार कप्तान के कार्यकाल मे आपको क्या देखने सुनने मिलता है…










